औद्योगीकरण : क्रांति के बाद रूस में सारे बैंकों, कारखानों व खदानों को शासकीय संपत्ति घोषित किया गया और निजी संपत्ति खत्म की गई थी। अब उनका संचालन राज्य द्वारा किया जाने लगा। 1924 के बाद सोवियत रूस के सामने आर्थिक विकास और औद्योगीकरण की चुनौती थी।
युद्ध, क्रांति और गृहयुद्ध से ध्वस्त आर्थिक व्यवस्था को विकास की पटरी पर लाना था। 1928 से सोवियत रूस में नियोजित विकास की शुरुआत हुई जिसमें औद्योगीकरण पर विशेष ज़ोर था। लेकिन इसके लिए धन और तकनीकी विशेषज्ञों का अभाव था। ऐसे में पहले विदेशों से विशेषज्ञ बुलाए गए और उनकी मदद से उद्योग निर्मित किए जाने लगे।
जहाँ तक धन और पूँजी का सवाल था, यह किसी विदेशी स्रोत से उपलब्ध नहीं था और रूस को अपने स्रोतों से व्यवस्था करनी पड़ी। इसके लिए जितनी भी बचत उपलब्ध थी उसे उद्योगों में झोंका गया, मज़दूरों का वेतन कम रखा गया और किसानों पर कर लगाकर अतिरिक्त निवेश की व्यवस्था की गई।
यह माना गया कि उद्योगों के विकास से बाद में मज़दूरों व किसानों को फायदा मिलेगा। 1928 के बाद रूस में औद्योगीकरण तेज हुआ और इसमें भारी उद्योगों (लोहा-इस्पात, बिजली, मशीन उत्पादन आदि) पर विशेष ज़ोर था। 1940 तक सोवियत संघ एक ताकतवर औद्योगिक देश बन गया।